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श्री दत्तात्रेयवज्रकवचम्‌

॥श्रीहरि:॥
दत्तात्रयवज्रकवच

॥श्रीदत्तात्रेयवज्रकवचम्‌॥
श्रीगणेशाय नम:। श्रीदत्तात्रेयाय नम:। ऋषय ऊचु:।
कथं संकल्पसिद्धि: स्याद्वेदव्यास कलौ युगे।
धर्मार्थकाममोक्षणां साधनं किमुदाह्रतम्‌॥१॥
व्यास उवाच।
श्रृण्वन्तु ऋषय: सर्वे शीघ्रं संकल्पसाधनम्‌।
सकृदुच्चारमात्रेण भोगमोक्षप्रदायकम्‌॥२॥
गौरीश्रृङ्गे हिमवत: कल्पवृक्षोपशोभितम्‌।
दीप्ते दिव्यमहारत्नहेममण्डपमध्यगम्‌॥३॥
रत्नसिंहासनासीनं प्रसन्नं परमेश्वरम्‌।
मन्दस्मितमुखाम्भोजं शङ्करं प्राह पार्वती॥४॥
श्रीदेव्युवाच
देवदेव महादेव लोकशङ्कर शङ्कर।
मन्त्रजालानि सर्वाणि यन्त्रजालानि कृत्स्नश:॥५॥
तन्त्रजालान्यनेकानि मया त्वत्त: श्रुतानि वै।
इदानीं द्रष्टुमिच्छामि विशेषेण महीतलम्‌॥६॥
इत्युदीरितमाकर्ण्य पार्वत्या परमेश्वर:।
करेणामृज्य संतोषात्पार्वतीं प्रत्यभाषत॥७॥
मयेदानीं त्वया सार्धं वृषमारुह्य गम्यते।
इत्युक्त्वा वृषमारुह्य पार्वत्या सह शङ्कर:॥८॥
ययौ भूमण्डलं द्रष्टुं गौर्याश्चित्राणि दर्शयन्‌।
क्वचिद्‌ विन्ध्याचलप्रान्ते महारण्ये सुदुर्गमे॥९॥
तत्र व्याहन्तुमायान्तं भिल्लं परशुधारिणम्‌।
वध्यमानं महाव्याघ्रं नखदंष्ट्राभिरावृतम्‌॥१०॥
अतीव चित्र…

श्रीराम तांडव स्तोत्रम्

श्रीराम तांडव स्तोत्रम्

[सानुवाद]

इंद्रादयो ऊचु: (इंद्र आदि ने कहा)

जटाकटाहयुक्तमुण्डप्रान्तविस्तृतम् हरे:
अपांगक्रुद्धदर्शनोपहार चूर्णकुन्तलः।
प्रचण्डवेगकारणेन पिंजलः प्रतिग्रहः
स क्रुद्धतांडवस्वरूपधृक् विराजते हरि: ॥१॥
जटासमूह से युक्त विशालमस्तक वाले श्रीहरि के क्रोधित हुए लाल आंखों की तिरछी नज़र से, विशाल जटाओं के बिखर जाने से रौद्र मुखाकृति एवं प्रचण्ड वेग से आक्रमण करने के कारण विचलित होती, इधर उधर भागती शत्रुसेना के मध्य तांडव (उद्धत विनाशक क्रियाकलाप) स्वरूप धारी भगवान् हरि शोभित हो रहे हैं।

अथेह व्यूहपार्ष्णिप्राग्वरूथिनी निषंगिनः
तथांजनेयऋक्षभूपसौरबालिनन्दना:।
प्रचण्डदानवानलं समुद्रतुल्यनाशका:
नमोऽस्तुते सुरारिचक्रभक्षकाय मृत्यवे ॥२॥
अब वो देखो !! महान् धनुष एवं तरकश धारण वाले प्रभु की अग्रेगामिनी, एवं पार्श्वरक्षिणी महान् सेना जिसमें हनुमान्, जाम्बवन्त, सुग्रीव, अंगद आदि वीर हैं, प्रचण्ड दानवसेना रूपी अग्नि के शमन के लिए समुद्रतुल्य जलराशि के समान नाशक हैं, ऐसे मृत्युरूपी दैत्यसेना के भक्षक के लिए मेरा प्रणाम है।

कलेवरे कषायवासहस्तकार्मुकं हरे:
उपासनोपसंगमार्थधृग्विशाखमंडल…

श्री शिव चालीसा

॥ दोहा ॥
जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान। कहत अयोध्यादास तुम, देहु अभय वरदान ॥

॥ चौपाई ॥
जय गिरिजा पति दीन दयाला। सदा करत सन्तन प्रतिपाला ॥
भाल चन्द्रमा सोहत नीके। कानन कुण्डल नागफनी के ॥
अंग गौर शिर गंग बहाये। मुण्डमाल तन क्षार लगाए ॥
वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे। छवि को देखि नाग मन मोहे ॥

मैना मातु की हवे दुलारी। बाम अंग सोहत छवि न्यारी ॥
कर त्रिशूल सोहत छवि भारी। करत सदा शत्रुन क्षयकारी ॥
नन्दि गणेश सोहै तहँ कैसे। सागर मध्य कमल हैं जैसे ॥
कार्तिक श्याम और गणराऊ। या छवि को कहि जात न काऊ ॥

देवन जबहीं जाय पुकारा। तब ही दुख प्रभु आप निवारा ॥
किया उपद्रव तारक भारी। देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी ॥
तुरत षडानन आप पठायउ। लवनिमेष महँ मारि गिरायउ ॥
आप जलंधर असुर संहारा। सुयश तुम्हार विदित संसारा ॥

त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई। सबहिं कृपा कर लीन बचाई ॥
किया तपहिं भागीरथ भारी। पुरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी ॥
दानिन महँ तुम सम कोउ नाहीं। सेवक स्तुति करत सदाहीं ॥
वेद माहि महिमा तुम गाई। अकथ अनादि भेद नहिं पाई ॥

प्रकटी उदधि मंथन में ज्वाला। जरत सुरासुर भए विहाला ॥
कीन्ही दया तहं करी सहाई। नीलकण्ठ तब नाम कहा…