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अहोई माता की आरती

अहोई अष्टमी व्रत कथा
अहोई अष्टमी व्रत की दो लोक कथाएँ प्रचलित हैं-

प्रथम कथा
प्राचीन काल में किसी नगर में एक साहूकार रहता था। उसके सात लड़के थे। दीपावली से पहले साहूकार की स्त्री घर की लीपा-पोती हेतु मिट्टी लेने खदान में गई और कुदाल से मिट्टी खोदने लगी। दैव योग से उसी जगह एक सेह की मांद थी। सहसा उस स्त्री के हाथ से कुदाल सेह के बच्चे को लग गई जिससे सेह का बच्चा तत्काल मर गया। अपने हाथ से हुई हत्या को लेकर साहूकार की पत्नी को बहुत दु:ख हुआ परन्तु अब क्या हो सकता था? वह शोकाकुल पश्चाताप करती हुई अपने घर लौट आई। कुछ दिनों बाद उसके बेटे का निधन हो गया। फिर अकस्मात दूसरा, तीसरा और इस प्रकार वर्ष भर में उसके सभी बेटे मर गए। महिला अत्यंत व्यथित रहने लगी। एक दिन उसने अपने आस-पड़ोस की महिलाओं को विलाप करते हुए बताया कि उसने जान-बूझ कर कभी कोई पाप नहीं किया। हाँ, एक बार खदान में मिट्टी खोदते हुए अंजाने में उससे एक सेह के बच्चे की हत्या अवश्य हुई है और तत्पश्चात् मेरे सातों बेटों की मृत्यु हो गई। यह सुनकर पास-पड़ोस की वृद्ध औरतों ने साहूकार की पत्नी को दिलासा देते हुए कहा कि यह बात बताकर तुमने …

श्रीमद् हनुमन्त बीसा

॥ श्रीमद् हनुमन्त बीसा ।।

।। दोहा ।। 

राम भक्त विनती करूँ,सुन लो मेरी बात । 
दया करो कुछ मेहर उपाओ, सिर पर रखो हाथ ।। 

।।। चौपाई ।। 

जय हनुमन्त, जय तेरा बीसा,कालनेमि को जैसे खींचा ।।१॥ 
करुणा पर दो कान हमारो,शत्रु हमारे तत्क्षण मारो ।।२॥ 
राम भक्त जय जय हनुमन्ता, लंका को थे किये विध्वंसा ।।३॥ 
सीता खोज खबर तुम लाए, अजर अमर के आशीष पाए ।।४॥ 
लक्ष्मण प्राण विधाता हो तुम,राम के अतिशय पासा हो तुम ।।५॥ 
जिस पर होते तुम अनुकूला, वह रहता पतझड़ में फूला ।।६॥ 
राम भक्त तुम मेरी आशा, तुम्हें ध्याऊँ मैं दिन राता ।।७॥ 
आकर मेरे काज संवारो, शत्रु हमारे तत्क्षण मारो ।।८॥ 
तुम्हरी दया से हम चलते हैं, लोग न जाने क्यों जलते हैं ।।९॥ 
भक्त जनों के संकट टारे, राम द्वार के हो रखवारे ।।१०॥ 
मेरे संकट दूर हटा दो, द्विविधा मेरी तुरन्त मिटा दो ।।११॥ 
रुद्रावतार हो मेरे स्वामी, तुम्हरे जैसा कोई नाहीं ।।१२॥
ॐ हनु हनु हनुमन्त का बीसा, बैरिहु मारु जगत के ईशा ।।१३॥
तुम्हरो नाम जहाँ पढ़ जावे, बैरि व्याधि न नेरे आवे ।।१४॥
तुम्हरा नाम जगत सुखदाता, खुल जाता है राम दरवाजा ।।१५॥
संकट मोचन प्रभु हमारो, भूत प्रेत पिशाच को मारो ।।१६॥
अंजनी पु…

करवा चौथ

करवाचौथ | करक चतुर्थी

उद्देश्यसौभाग्यवती स्त्रियाँ अपने पति की दीर्घायु के लिए व्रत रखती हैं।
प्रारम्भपौराणिक काल
तिथिकार्तिक मास में कृष्ण पक्ष की चतुर्थी

सरगीसास (पति की माँ) अपनी बहू को सरगी भेजती है। सरगी में मिठाई, फल, सेवइयां आदि होती है। इसका सेवन महिलाएं करवाचौथ के दिन सूर्य निकलने से पहले करती हैं।
अन्य जानकारीकरवा चौथ व्रत को रखने वाली स्त्रियों को प्रात:काल स्नान आदि के बाद आचमन करके पति, पुत्र-पौत्र तथा सुख-सौभाग्य की इच्छा का संकल्प लेकर इस व्रत को करना चाहिए।
करवा चौथ  का पर्व भारत में उत्तर प्रदेश, पंजाब, राजस्थान और गुजरात में मुख्य रूप से मनाया जाता है। करवा चौथ का व्रत कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष में चंद्रोदय व्यापिनी चतुर्थी को किया जाता है। करवा चौथ स्त्रियों का सर्वाधिक प्रिय व्रत है। यों तो प्रत्येक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को गणेश जी और चंद्रमा का व्रत किया जाता है। परंतु इनमें करवा चौथ का सर्वाधिक महत्त्व है। इस दिन सौभाग्यवती स्त्रियां अटल सुहाग, पति की दीर्घ आयु, स्वास्थ्य एवं मंगलकामना के लिए यह व्रत करती हैं। वामन पुराण में करवा चौथ व्रत का वर्णन आता है।