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सुभाषितानि

There is no calamity greater than lavish desires. There is no greater guilt than discontent. And there is no greater disaster than greed.
- Lau Tzuअत्यधिक महत्त्वाकांक्षाओं से बड़ी विपत्ति नहीं है, असंतोष से बड़ा अपराध-बोध नहीं है और लालच से बड़ा अमंगल नहीं है।
- लाओत्से 
Who is wise? The person that learns from everyone. Who is strong? The person who has control over his passions. Who is honoured? The person who honours others. And who is rich? The person who is satisfied with what he has.
- Av Ben Zoma i Mishnahबुद्धिमान कौन है, जो सबसे कुछ सीख लेता है; शक्तिशाली कौन है, जिसका अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण है; सम्मानित कौन है, जो दूसरों का सम्मान करता है और धनवान कौन है, जो अपने पास जो भी है, उससे ही प्रसन्न है।
- अव बेन जोमा इ मिश्नाह
We do not so much need the help of our friends as the confidence of their help in need.
- Epicurusहमें अपने मित्रों के सहयोग की उतनी आवश्यकता नहीं होती है जितना कि उनके सहयोग के विश्वास की आवश्यकता होती है।
- एपिकुरुस
We don't see things as they are, …

रामायणं

यत्पूर्वं प्रभुणा कृतं सुकविना श्रीशम्भुना दुर्गमं 
श्रॆमद्रामपदाब्जभक्तिमनिशम प्राप्त्यै तू रामायणं।
मत्वा तद्रघुनाथनामनिरतम स्वान्तस्तम:शान्तये
भाषाबद्ध्मिदम चकार तुलसीदासस्तथा मानसं।।1।।
पुण्यं पापहरं सदा शिवकरं विज्ञानाभाक्तिप्रदम
मायामोहमलापहं सुविमलं प्रेमाम्बुपूरं शुभम।
श्रॆमद्रामचरितमानसमिदम भक्त्यावगाहन्ति ये
ते सन्सारपतनगघोरकिरनैर्दह्यन्ति नो मानवाः।।2।।

रामत्व

*रामत्व है क्या* ???*काजु हमार तासु हित होई**मेरा काम भी बने और अगले की भी हानि न हो*,
यदि कोई वैरी भी है तो उसकी भी हित की चिंता ही रामत्व है।
और हमलोग?
हमलोग प्रायः यहीं पर चूक जाते हैं।
अपने हित के लिए,
अपने काम बनाने के चक्कर में यह भूल जाते हैं कि मेरे कारण किसी को क्षति हो रही है।
हम अपने लक्ष्य प्राप्ति के चक्कर में कितने के सद् आकांक्षाओं को भी कुचल देते हैं।
जरा उस दृश्य को अपने मन में कल्पना करें कि जब अंगद श्रीराम जी के आज्ञा से दूत बनकर लंका में जाने लगे...
बालितनय बुधि बल धामा। लंका जाहु तात मम कामा।।
अर्थात् अंगद श्रीराम जी के काम से जा रहे हैं, अतः उन्हें चाहिए कि जो श्रीराम काज में बाधक बने उसे शत्रु भाव से उसके साथ व्यवहार करना है। और इस दौरान उसकी अर्थात् दूसरे पक्ष की चिंता नहीं करना चाहिए पर श्रीराम जी कहते हैं कि नहीं,
हमें अपने हित साधने के चक्कर में इतना ध्यान रखना ही चाहिए कि यदि संभव हो तो शत्रु की भी भलाई सोचें।
क्योंकि वास्तव में न तो कोई किसी का शत्रु है और न मित्र बल्कि कुछ कारण, परिस्थिति हैं जो हमें वहां खड़ा कर देता है कि प्रतीत होता है कि हम एक दूसरे …

दुर्गाष्टमी

दुर्गाष्टमी का हिन्दू धर्म में बड़ा ही महत्त्व है। प्रत्येक माह में शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि पर दुर्गाष्टमी व्रत किया जाता है, इसे 'मासिक दुर्गाष्टमी' भी कहते हैं। इस दौरान श्रद्धालु दुर्गा माता की पूजा करते हैं और उनके लिए पूरे दिन का व्रत करते हैं। मुख्य दुर्गाष्टमी, जिसे 'महाष्टमी' कहा जाता है, आश्विन माह में नौ दिन के शारदीय नवरात्र उत्सव के दौरान पड़ती है। दुर्गाष्टमी को 'दुर्गा अष्टमी' और 'मासिक दुर्गाष्टमी' को 'मास दुर्गाष्टमी' के नाम से भी जाना जाता है। भगवती दुर्गा को उबाले हुए चने, हलवा-पूरी, खीर, पुए आदि का भोग लगाया जाता है। इस दिन देवी दुर्गा की मूर्ति का मन्त्रों से विधिपूर्वक पूजन किया जाता है। बहुत-से व्यक्ति इस महाशक्ति को प्रसन्न करने के लिए हवन आदि भी करते हैं। शक्तिपीठों में इस दिन बहुत उत्सव मनाया जाता है।
तिथिप्रत्येक माह में शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को 'दुर्गाष्टमी' मनाई जाती है। मुख्य दुर्गाष्टमी, जिसे 'महाष्टमी' कहा जाता है, आश्विन माह में नौ दिन के शारदीय नवरात्र उत्सव के दौरान पड़ती है।
धार्मिक मान्यत…

महिषासुरमर्दिनि स्तोत्रम्

अयि गिरिनन्दिनि नन्दितमेदिनि विश्वविनोदिनि नन्दिनुते
गिरिवरविन्ध्यशिरोऽधिनिवासिनि विष्णुविलासिनि जिष्णुनुते ।
भगवति हे शितिकण्ठकुटुम्बिनि भूरिकुटुम्बिनि भूरिकृते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १ ॥

सुरवरवर्षिणि दुर्धरधर्षिणि दुर्मुखमर्षिणि हर्षरते
त्रिभुवनपोषिणि शङ्करतोषिणि किल्बिषमोषिणि घोषरते
दनुजनिरोषिणि दितिसुतरोषिणि दुर्मदशोषिणि सिन्धुसुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २ ॥

अयि जगदम्ब मदम्ब कदम्ब वनप्रियवासिनि हासरते
शिखरि शिरोमणि तुङ्गहिमलय शृङ्गनिजालय मध्यगते ।
मधुमधुरे मधुकैटभगञ्जिनि कैटभभञ्जिनि रासरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ३ ॥

अयि शतखण्ड विखण्डितरुण्ड वितुण्डितशुण्द गजाधिपते
रिपुगजगण्ड विदारणचण्ड पराक्रमशुण्ड मृगाधिपते ।
निजभुजदण्ड निपातितखण्ड विपातितमुण्ड भटाधिपते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ४ ॥

अयि रणदुर्मद शत्रुवधोदित दुर्धरनिर्जर शक्तिभृते
चतुरविचार धुरीणमहाशिव दूतकृत प्रमथाधिपते ।
दुरितदुरीह दुराशयदुर्मति दानवदुत कृतान्तमते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ५ ॥

अयि शरणागत वैरिवधुवर वीरवराभय दायकरे
लल्ला की सुन के मै आयी यशोदा मैया देदो बधाई,
कान्हा की सुनके मै आयी यशोदा मैया देदो बधाई,
लाला जनम सुन आयी यशोदा मैया देदो बधाई।

देदो बधाई मैया देदो बधाई,
लल्ला की सुन के मै आयी यशोदा मैया देदो बधाई।

टीका भी लूँगी मैया, बिंदियां भी लूँगी,
रेशम की लूँगी रजाई यशोदा मैया देदो बधाई।

साड़ी भी लूँगी मैया, लहँगा भी लूँगी,
धोती भी लूँगी मैया, कुर्ता भी लूँगी,
पगडि की होगी चढ़ाई यशोदा मैया देदो बधाई।

हरवा भी लूँगी मैया, चुड़ि भी लूँगी,
कंगना पे होगी चढ़ाई यशोदा मैया देदो बधाई।

चन्द्र सखी भज, बाल कृष्ण छवि,
नित नित जाऊँ बलिहारी यशोदा मैया देदो बधाई।

स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान् सर्वत्र पूज्यते

विद्वत्वं च नृपत्वं च न एव तुल्ये कदाचन्। स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान् सर्वत्र पूज्यते॥

भावार्थ :
विद्वता और राज्य अतुलनीय हैं, राजा को तो अपने राज्य में ही सम्मान मिलता है पर विद्वान का सर्वत्र सम्मान होता है|


स्वगृहे पूज्यते मूर्खः स्वग्रामे पूज्यते प्रभुः। स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान् सर्वत्र पूज्यते।।

अर्थात- मूर्ख अपने घर में महत्व पाता है, प्रभु (धनाड्य व्यक्ति) अपने गाँव में और राजा अपने देश में पूजा जाता है। जबकि विद्वान सभी जगहों पर पूजा जाता है।

चतुः श्लोकी भागवत Chatuh Shloki Bhagwat

चतुः श्लोकी भागवत श्रीभगवानुवाच - 
अहमेवासमेवाग्रे नान्यद्
यत् सदसत् परम्। 
पश्चादहं यदेतच्च 
योऽवशिष्येत सोऽस्म्यहम् ॥१॥

ऋतेऽर्थं यत् प्रतीयेत 
न प्रतीयेत चात्मनि। 
तद्विद्यादात्मनो मायां 
यथाऽऽभासो यथा तमः ॥२॥

यथा महान्ति भूतानि 
भूतेषूच्चावचेष्वनु। 
प्रविष्टान्यप्रविष्टानि 
तथा तेषु न तेष्वहम्॥३॥

एतावदेव जिज्ञास्यं 
तत्त्वजिज्ञासुनाऽऽत्मनः। 
अन्वयव्यतिरेकाभ्यां यत् 
स्यात् सर्वत्र सर्वदा॥४॥

श्री भगवान कहते हैं - सृष्टि से पूर्व केवल मैं ही था। सत्, असत् या उससे परे मुझसे भिन्न कुछ भी नहीं था। सृष्टि न रहने पर (प्रलय काल में) भी मैं ही रहता हूँ। यह सब सृष्टि रूप भी मैं ही हूँ और जो कुछ इस सृष्टि, स्थिति तथा प्रलय से बचा रहता है, वह भी मै ही हूँ॥१॥
जो मुझ मूल तत्त्व के अतिरिक्त (सत्य सा) प्रतीत होता(दिखाई देता) है परन्तु आत्मा में प्रतीत नहीं होता (दिखाई नहीं देता), उस अज्ञान को आत्मा की माया समझो जो प्रतिबिम्ब या अंधकार की भांति मिथ्या है॥२॥
जैसे पंचमहाभूत (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश) संसार के छोटे-बड़े सभी पदार्थों में प्रविष्ट होते हुए भी उनमें प्रविष्ट नहीं हैं, वैसे ही मैं भी सबमें व्याप्त हो…

सुभाषितानि

अकारणं रूपमकारणं कुलं महत्सु नीचेषु च कर्म शोभते।
इदं हि रूपं परिभूतपूर्वकं तदेव भूयो बहुमानमागतम्॥


Neither beauty nor lineage is the factor responsible for people to be great or small. Be a mighty or a small person, it is his work that adores him. If one concentrates more on his work than his external appearance, he will surely attain more respect. लोगों के लिए महान या छोटा होने के लिए न तो उनका सौंदर्य और न ही कुल जिम्मेदार घटक हैं। चाहे कोई बड़ा हो या छोटा हो, यह उस व्यक्ति का कार्य है जो उसे बनाता हैं। यदि कोई सुंदरता की अपेक्षा अपने काम पर अधिक ध्यान केंद्रित करता है, तो वह निश्चित रूप से अधिक सम्मान प्राप्त करेगा।

सुभाषितानि

चित्र
विद्या ददाति विनयं विनयाद्याति पात्रताम् ।
पात्रत्वाद्धनमाप्नोति धनाद्धर्मं ततः सुखम् ॥


Knowledge gives modesty, through modesty comes worthiness. By worthiness one gets prosperity and from prosperity (one does) good deeds and thereupon (one is) free from sorrow.

विद्या विनय देती हैं, विनय से योग्यता आती हैं। योग्यता से सम्म्पन्नता आती हैं, जिस से कर्तव्य-कर्म कर पाना संभव होता हैं, जिससे अंततः उसे दुखरहित स्थिति प्राप्त होती हैं।


निर्वाण षटकम्

निर्वाण षटकम्

मनो बुध्यहंकारचित्तानि नाहम् न च श्रोत्र जिह्वे न च घ्राण नेत्रे
न च व्योम भूमिर  न तेजो न वायुः चिदानन्द रूपः शिवोहम्  शिवोहम् ॥

न च प्राण संज्ञो न वै पञ्चवायुः न वा सप्तधातुर् न वा पञ्चकोशः
न वाक्पाणिपादौ  न चोपस्थपायू  चिदानन्द रूपः शिवोहम्  शिवोहम् ॥

न मे द्वेष रागौ न मे लोभ मोहौ मदो नैव मे नैव मात्सर्य भावः
न धर्मो न चार्थो न कामो ना  मोक्षः चिदानन्द रूपः शिवोहम्  शिवोहम् ॥

न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दुःखम् न मंत्रो न तीर्थं न वेदाः न यज्ञाः
अहं भोजनं नैव भोज्यं न भोक्ता चिदानन्द रूपः शिवोहम्  शिवोहम् ॥

न मृत्युर् न शंका न मे जातिभेदः पिता नैव  मे नैव माता न जन्म
न बन्धुर् न मित्रं गुरुर्नैव शिष्यः चिदानन्द रूपः शिवोहम्  शिवोहम् ॥

अहं निर्विकल्पो निराकार रूपो विभुत्वाच्च सर्वत्र सर्वेंद्रियाणाम्
न चासंगतं नैव मुक्तिर् न मेयः चिदानन्द रूपः शिवोहम्  शिवोहम् ॥

मनसा सततम् स्मरणीयम्

मनसा सततम् स्मरणीयम्
वचसा सततम् वदनीयम्
लोकहितम् मम करणीयम् ॥धृ॥ न भोग भवने रमणीयम्
न च सुख शयने शयनीयम्
अहर्निशम् जागरणीयम्
लोकहितम् मम करणीयम् ॥१॥ न जातु दुःखम् गणनीयम्
न च निज सौख्यम् मननीयम्
कार्य क्षेत्रे त्वरणीयम्
लोकहितम् मम करणीयम् ॥२॥ दुःख सागरे तरणीयम्
कष्ट पर्वते चरणीयम्
विपत्ति विपिने भ्रमणीयम्
लोकहितम् मम करणीयम् ॥३॥ गहनारण्ये घनान्धकारे
बन्धु जना ये स्थिता गह्वरे
तत्र मया सन्चरणीयम्
लोकहितम् मम करणीयम् ॥४॥

प्रणम्य शिरसा देवं

प्रणम्य शिरसा देवं
प्रणम्य शिरसा देवं गौरीपुत्रं विनायकम् ।
भक्तावासं स्मरेन्नित्यं आयुःकामार्थसिद्धये ॥ १॥ प्रथमं वक्रतुण्डं च एकदन्तं द्वितीयकम् । तृतीयं कृष्णपिङ्गाक्षं गजवक्त्रं चतुर्थकम् ॥ २॥ लम्बोदरं पञ्चमं च षष्ठं विकटमेव च ।
सप्तमं विघ्नराजेन्द्रं धूम्रवर्णं तथाष्टमम् ॥ ३॥ नवमं भालचन्द्रं च दशमं तु विनायकम् ।
एकादशं गणपतिं द्वादशं तु गजाननम् ॥ ४॥ द्वादशैतानि नामानि त्रिसंध्यं यः पठेन्नरः ।
न च विघ्नभयं तस्य सर्वसिद्धिकरः प्रभुः ॥ ५॥ विद्यार्थी लभते विद्यां धनार्थी लभते धनम् ।
पुत्रार्थी लभते पुत्रान्मोक्षार्थी लभते गतिम् ॥ ६॥ जपेद्गणपतिस्तोत्रं षड्भिर्मासैः फलं लभेत् ।
संवत्सरेण सिद्धिं च लभते नात्र संशयः ॥ ७॥ अष्टेभ्यो ब्राह्मणेभ्यश्च लिखित्वा यः समर्पयेत् ।
तस्य विद्या भवेत्सर्वा गणेशस्य प्रसादतः ॥ ८॥

श्री गजानन प्रसन्न

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॥ श्री गजानन प्रसन्न ॥

गणनायकाय गणदेवताय गणाध्यक्षाय धीमहि ।
गुणशरीराय गुणमण्डिताय गुणेशानाय धीमहि ।
गुणातीताय गुणाधीशाय गुणप्रविष्टाय धीमहि ।
एकदंताय वक्रतुण्डाय गौरीतनयाय धीमहि ।
गजेशानाय भालचन्द्राय श्रीगणेशाय धीमहि ॥

गानचतुराय गानप्राणाय गानान्तरात्मने ।
गानोत्सुकाय गानमत्ताय गानोत्सुकमनसे ।
गुरुपूजिताय गुरुदेवताय गुरुकुलस्थायिने ।
गुरुविक्रमाय गुह्यप्रवराय गुरवे गुणगुरवे ।
गुरुदैत्यगलच्छेत्रे गुरुधर्मसदाराध्याय ।
गुरुपुत्रपरित्रात्रे गुरुपाखण्डखण्डकाय ।
गीतसाराय गीततत्त्वाय गीतगोत्राय धीमहि ।
गूढगुल्फाय गन्धमत्ताय गोजयप्रदाय धीमहि ।
गुणातीताय गुणाधीशाय गुणप्रविष्टाय धीमहि ।
एकदंताय वक्रतुण्डाय गौरीतनयाय धीमहि ।
गजेशानाय भालचन्द्राय श्रीगणेशाय धीमहि ॥

ग्रन्थगीताय ग्रन्थगेयाय ग्रन्थान्तरात्मने ।
गीतलीनाय गीताश्रयाय गीतवाद्यपटवे ।
गेयचरिताय गायकवराय गन्धर्वप्रियकृते ।
गायकाधीनविग्रहाय गङ्गाजलप्रणयवते ।
गौरीस्तनन्धयाय गौरीहृदयनन्दनाय ।
गौरभानुसुताय गौरीगणेश्वराय ।
गौरीप्रणयाय गौरीप्रवणाय गौरभावाय धीमहि ।
गोसहस्राय गोवर्धनाय गोपगोपाय धीमहि ।
गुणातीताय गुणाधीशाय गुणप्रविष्टाय धीमहि ।

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