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शनिवार, 27 अक्तूबर 2018

सुभाषितानि

There is no calamity greater than lavish desires. There is no greater guilt than discontent. And there is no greater disaster than greed.
- Lau Tzu अत्यधिक महत्त्वाकांक्षाओं से बड़ी विपत्ति नहीं है, असंतोष से बड़ा अपराध-बोध नहीं है और लालच से बड़ा अमंगल नहीं है।
- लाओत्से 
Who is wise? The person that learns from everyone. Who is strong? The person who has control over his passions. Who is honoured? The person who honours others. And who is rich? The person who is satisfied with what he has.
- Av Ben Zoma i Mishnah बुद्धिमान कौन है, जो सबसे कुछ सीख लेता है; शक्तिशाली कौन है, जिसका अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण है; सम्मानित कौन है, जो दूसरों का सम्मान करता है और धनवान कौन है, जो अपने पास जो भी है, उससे ही प्रसन्न है।
- अव बेन जोमा इ मिश्नाह
We do not so much need the help of our friends as the confidence of their help in need.
- Epicurus हमें अपने मित्रों के सहयोग की उतनी आवश्यकता नहीं होती है जितना कि उनके सहयोग के विश्वास की आवश्यकता होती है।
- एपिकुरुस
We don't see things as they are, we see things as we are.
- Anais Nin हम परिस्थितियों को वैसा नहीं देखते जैसी कि वो हैं बल्कि जैसे कि हम स्वयं हैं।
- अनैस निन
There are things I can't force. I must adjust. There are times when the greatest change needed is a change of my viewpoint.

- Denis Diderot कभी-कभी ऐसी परिस्थिति होती है कि मैं दबाव नहीं डाल सकता, मुझे उसके अनुसार ढलना होता है । कभी-कभी ऐसा समय होता है कि सबसे बड़ा परिवर्तन स्वयं में करना होता है।
- डेनिस दिड़ेरोट
Success consists of going from failure to failure without loss of enthusiasm.
- Winston Churchill सफलता एक असफलता से दूसरी असफलता तक बिना उत्साह खोये प्रयत्न करने से मिलती है।
- विंस्टन चर्चिल
When I look back on all these worries, I remember the story of the old man who said...that he had a lot of issues in his life, most of which never happened.
- Winston Churchill जब भी मैं सभी चिंताओं के बारे में सोचता हूँ, तो मैं उस वृद्ध व्यक्ति की कहानी याद कर लेता हूँ जिसने कहा था - मेरे जीवन में बहुत परेशानियाँ आयीं पर उनमें से बहुत सी कभी वास्तव में हुई ही नहीं।
- विंस्टन चर्चिल
Time is neutral; but it can be made the ally of those who will seize it and use it to the full.
- Winston Churchill समय पक्षपातरहित है, पर यह उनके द्वारा अपना सहयोगी बनाया जा सकता है जो इसके व्यर्थ खर्च पर नियंत्रण रखते हुए इसका सदुपयोग करते हैं।
- विंस्टन चर्चिल
It is a crime to despair. We must learn to draw from misfortune the means of future strength.
- Winston Churchill निराश होना अपराध है, हमें दुर्भाग्य से अपने भविष्य के लिए शक्ति (प्रेरणा)  प्राप्त करना अवश्य आना चाहिए।
- विंस्टन चर्चिल
Eating my words has never given me indigestion.
- Winston Churchill कम बोलने से मुझे कभी नुकसान नहीं हुआ।
- विंस्टन चर्चिल
Continuous effort - not strength or intelligence - is the key to unlocking our potential.
- Winston Churchill लगातार प्रयत्न हमारी वास्तविक (असीमित) क्षमता को प्रकट करते हैं, न कि शक्ति या बुद्धि।
- विंस्टन चर्चिल
I am reminded of the professor who, in his declining hours, was asked by his devoted pupils for his final counsel. He replied, 'Verify your quotations.'
- Winston Churchill मुझे वह अध्यापक याद आता है जिससे उसके अंतिम क्षणों में उसके प्रिय शिष्यों ने उससे अंतिम उपदेश देने की इच्छा की । उसने उत्तर दिया - अपने ध्येय वाक्यों का परीक्षण करो।
- विंस्टन चर्चिल 
For myself I am an optimist - it does not seem to be much use being anything else.
- Winston Churchill मैं आशावादी हूँ क्योंकि कुछ और होने से कोई लाभ नहीं दिखता।
- विंस्टन चर्चिल
Our greatest glory is not in never falling, but in rising every time we fall.
- Confucius हमारा सबसे बड़ा गौरव कभी न गिरने में नहीं है पर गिर कर हर बार फिर उठने में है।
- कनफूशिएस
Everything that is really great and inspiring is created by the individual who can labor in freedom.
- Albert Einstein वह सब कुछ जो महान और प्रेरणादायक है, किसी उस व्यक्ति द्वारा निर्मित है जो स्वतंत्रता में परिश्रम कर सकता है।
- अल्बर्ट आइन्स्टाइन
Keep on sowing your seed, for you never know which will grow - perhaps it all will.
- Albert Einstein तुम अपने शुभ कर्मों रूपी बीज बोते रहो क्योंकि तुम्हें पता नहीं है कि इनमें से कौन सा फल देगा, हो सकता है कि सभी फल देने वाले हो जाएँ। 
- अल्बर्ट आइन्स्टाइन
The greatest wealth is to live content with little.
- Plato सबसे बड़ी रईसी (अमीरी) कम में खुश रहने में है।
- प्लेटो
At the touch of love everyone becomes a poet.
- Plato प्रेम के मधुर स्पर्श से सभी कवि बन जाते हैं।
- प्लेटो
When everything seems to be going against you, remember that the airplane takes off against the wind, not with it.
- Henry Ford जब तुम्हें सब कुछ अपने विपरीत जाता हुआ लगे तो यह ध्यान कर लेना कि जहाज हवा के विरुद्ध ही आकाश में उड़ना शुरू करता है।
- हेनरी फोर्ड
It has been my observation that most people get ahead during the time that others waste.
- Henry Ford मैंने यह पाया है कि ज्यादातर लोग उस समय दूसरों से आगे निकल जाते है जब दूसरे समय ख़राब कर रहे होते हैं।
- हेनरी फोर्ड
When I can't handle events, I let them handle themselves.
- Henry Ford जब मैं परिस्थितियों को नियंत्रित नहीं कर सकता हूँ तो उनको स्वयं नियंत्रित होने देता हूँ।
- हेनरी फोर्ड
Failure is simply the opportunity to begin again, this time more intelligently.
- Henry Ford असफलता, ज्यादा बुद्धिमता पूर्वक पुनः प्रयत्न करने का अवसर है। 
- हेनरी फोर्ड
Nothing is particularly hard if you divide it into small jobs.
- Henry Ford कुछ भी बहुत मुश्किल नहीं है अगर उसे छोटे छोटे कार्यों में बाँटा जा सके।   
- हेनरी फोर्ड
If you think you can do a thing or think you can't do a thing, you're right.
- Henry Ford अगर आप सोचते हैं कि आप कोई कार्य कर सकते हैं या सोचते हैं कि आप कोई कार्य नहीं कर सकते हैं तो आप दोनों ही स्थितियों में सही हैं।
- हेनरी फोर्ड
Fear defeats more people than any other one thing in the world.
- Ralph Waldo Emerson दुनिया में डर किसी भी और वस्तु से ज्यादा लोगों को हराता है।
- राल्फ वाल्डो एमर्सन
It is not length of life, but depth of life.
- Ralph Waldo Emerson लम्बे जीवन का नहीं वरन् गहरे जीवन का महत्त्व है। 
- राल्फ वाल्डो एमर्सन
There is no substitute for hard work.
- Thomas Edison कठिन परिश्रम का कोई विकल्प नहीं है।
- थॉमस एडिसन
Many of life’s failures are people who did not realize how close they were to success when they gave up.
- Thomas Edison व्यक्तियों के जीवन की बहुत सी असफलताएं,  सफलता के बहुत पास पहुँचने का अनुभव न कर पाने पर (निराश होकर) प्रयत्न न करने के कारण हैं।
- थॉमस एडिसन
Results! Why, man, I have gotten a lot of results. I know several thousand things that won't work.
- Thomas Edison परिणाम, आखिर क्यों ? मुझे बहुत से परिणाम मिले हैं। मुझे वह हजारों तरीके पता हैं जो काम नहीं करते हैं।
- थॉमस एडिसन
I am not discouraged, because every wrong attempt discarded is another step forward.
- Thomas Edison मैं हतोत्साहित नहीं हूँ क्योंकि हटाया गया प्रत्येक गलत प्रयत्न आगे की ओर बढाया गया एक कदम है।
- थॉमस एडिसन
Genius is one percent inspiration and ninety-nine percent perspiration.
- Thomas Edison प्रतिभा एक प्रतिशत प्रेरणा और निन्यानबे प्रतिशत परिश्रम है।
- थॉमस एडिसन
I never did a day's work in my life. It was all fun.
- Thomas Edison मैंने जीवन में एक दिन का भी कार्य नहीं किया, वह सब खेल (आनंद) था।
- थॉमस एडिसन
Be kind, for everyone you meet is fighting a hard battle.
- Plato सबके प्रति दयावान रहो क्योंकि जिससे भी तुम मिलते हो वह (जीवन की) एक कठिन लड़ाई लड़ रहा है।
- प्लेटो
There are two things a person should never be angry at, what they can help, and what they cannot.
- Plato दो परिस्थितियों में व्यक्ति को कभी क्रोध नहीं करना चाहिए - जब वह कुछ सहायता कर सकता है और जब वह कुछ सहायता नहीं कर सकता है।
- प्लेटो
The heart has its reasons of which reason knows nothing.
- Blaise Pascal हृदय के अपने तर्क हैं जिसका मस्तिष्क को कुछ पता नहीं है।
- ब्लेस पास्कल
It isn't the mountains ahead to climb that wear you out; it's the pebble in your shoe.
Muhammad Ali लांघने के लिए सामने दिखाई देने वाले पर्वत नहीं बल्कि आपके जूते में पड़ा हुआ कंकड़ आपको थकाता है। 
- मुहम्मद अली
Service to others is the rent you pay for your room here on earth.
- Muhammad Ali दूसरों की सेवा करना पृथ्वी पर आपके कमरे का किराया है जो आपको देना चाहिए। 
- मुहम्मद अली
Choose a job you love, and you will never have to work a day in your life.
- Confucius आप वह कार्य करें जिससे आपको प्रेम है फिर आपको जीवन में एक दिन भी कार्य नहीं करना पड़ेगा।
- कनफूशिएस
When it is obvious that the goals cannot be reached, don't adjust the goals, adjust the action steps.
- Confucius जब यह स्पष्ट हो जाये की लक्ष्यों को प्राप्त करना संभव नहीं है तो लक्ष्यों को न बदलते हुए अपने कार्य करने के तरीके को बदलें।
- कनफूशिएस
By three methods we may learn wisdom: First, by reflection, which is noblest; Second, by imitation, which is easiest; and third by experience, which is the bitterest.
- Confucius हम तीन तरीकों से बुद्धिमान बनते हैं - एक, मनन से, जो सर्वोत्तम है, दो, अनुकरण से, जो सबसे आसान है और तीन, अपने अनुभव से, जो सबसे कठोर है।
- कनफूशिएस
Expect much from yourself and little from others and you will avoid incurring resentments.
- Confucius अपने से ही ज्यादा उम्मीदें रक्खो दूसरों से नहीं, ऐसा करके तुम निराशा से बच सकते हो।>
- कनफूशिएस
A journey of a thousand miles begins with a single step.
- Confucius हज़ार मीलों लम्बी यात्रा भी एक कदम से ही शुरू होती है।
- कनफूशिएस
Try not to become a man of success, but rather try to become a man of value.
- Albert Einstein एक सफल मनुष्य बनने का प्रयत्न न करो बल्कि एक उत्तम मनुष्य बनने का प्रयत्न करो।
- अल्बर्ट आइन्स्टाइन 
Do not fear mistakes. You will know failure. Continue to reach out.
- Benjamin Franklin असफलता से मत डरो, असफलता को जानने के बाद प्रयत्न करना जारी रक्खो।
- बेंजामिन फ्रेंकलिन 
What you seem to be, be really.
- Benjamin Franklin जैसे तुम दिखना चाहते हो वैसे ही बन जाओ।
- बेंजामिन फ्रेंकलिन
Coming together is a beginning. Keeping together is progress. Working together is success.
- Henry Ford साथ आना शुरुआत है, साथ बने रहना प्रगति है और साथ में कार्य करते रहना सफलता है।
- हेनरी फोर्ड
Apply yourself both now and in the next life. Without effort, you cannot be prosperous. Though the land be good, you cannot have an abundant crop without cultivation.
- Plato स्वयं को कार्य में लगाये रक्खें इस जीवन में और अगले जीवन में भी, बिना परिश्रम के कोई भी सामर्थ्यवान नहीं होता है। भूमि अगर उर्वरा भी है फिर भी उसमें बिना खेती के अच्छी फसल पैदा नहीं होती है।
- प्लेटो
Good actions give strength to ourselves and inspire good actions in others.
- Plato शुभ कार्य स्वयं को मानसिक शक्ति देते हैं और दूसरों को भी अच्छे कार्य करने को प्रेरित करते हैं।
- प्लेटो
When you see a man of worth, think of how you may emulate him. When you see one who is unworthy, examine yourself.
- Confucius जब भी आप किसी उत्तम पुरुष को देखें तो सोचें कि उसका अनुकरण किस प्रकार किया जा सकता है। जब भी आप किसी अनुत्तम पुरुष को देखें तो पहले स्वयं को जांचें।
- कनफूशिएस
Your work is going to fill a large part of your life, and the only way to be truly satisfied is to do what you believe is great work. And the only way to do great work is to love what you do. If you haven't found it yet, keep looking. Don't settle. As with all matters of the heart, you'll know when you find it.- Steve Jobs आपका कार्य आपके जीवन का एक बड़ा भाग है, और वास्तव में संतुष्ट  रहने का केवल यही तरीका है कि आप वो करें जो कि आप मानते हैं कि बड़ा कार्य है। बड़ा कार्य करने का अकेला तरीका यही है कि आप अपने कार्य से प्रेम करें। यदि आपने अभी इस कार्य को नहीं पाया है, तो इसे तलाश करते रहें, चुप न बैठें। हृदय के बाकी मामलों की तरह इसमें भी आप जान जायेंगे जब आप अपना मनपसंद कार्य पाएंगे। - स्टीव जॉब्स

रविवार, 21 अक्तूबर 2018

रामायणं

यत्पूर्वं प्रभुणा कृतं सुकविना श्रीशम्भुना दुर्गमं 
श्रॆमद्रामपदाब्जभक्तिमनिशम प्राप्त्यै तू रामायणं।
मत्वा तद्रघुनाथनामनिरतम स्वान्तस्तम:शान्तये
भाषाबद्ध्मिदम चकार तुलसीदासस्तथा मानसं।।1।।
पुण्यं पापहरं सदा शिवकरं विज्ञानाभाक्तिप्रदम
मायामोहमलापहं सुविमलं प्रेमाम्बुपूरं शुभम।
श्रॆमद्रामचरितमानसमिदम भक्त्यावगाहन्ति ये
ते सन्सारपतनगघोरकिरनैर्दह्यन्ति नो मानवाः।।2।।

शनिवार, 20 अक्तूबर 2018

रामत्व

*रामत्व है क्या* ???

*काजु हमार तासु हित होई*

*मेरा काम भी बने और अगले की भी हानि न हो*,
यदि कोई वैरी भी है तो उसकी भी हित की चिंता ही रामत्व है।
और हमलोग?
हमलोग प्रायः यहीं पर चूक जाते हैं।
अपने हित के लिए,
अपने काम बनाने के चक्कर में यह भूल जाते हैं कि मेरे कारण किसी को क्षति हो रही है।
हम अपने लक्ष्य प्राप्ति के चक्कर में कितने के सद् आकांक्षाओं को भी कुचल देते हैं।
जरा उस दृश्य को अपने मन में कल्पना करें कि जब अंगद श्रीराम जी के आज्ञा से दूत बनकर लंका में जाने लगे...
बालितनय बुधि बल धामा। लंका जाहु तात मम कामा।।
अर्थात् अंगद श्रीराम जी के काम से जा रहे हैं, अतः उन्हें चाहिए कि जो श्रीराम काज में बाधक बने उसे शत्रु भाव से उसके साथ व्यवहार करना है। और इस दौरान उसकी अर्थात् दूसरे पक्ष की चिंता नहीं करना चाहिए पर श्रीराम जी कहते हैं कि नहीं,
हमें अपने हित साधने के चक्कर में इतना ध्यान रखना ही चाहिए कि यदि संभव हो तो शत्रु की भी भलाई सोचें।
क्योंकि वास्तव में न तो कोई किसी का शत्रु है और न मित्र बल्कि कुछ कारण, परिस्थिति हैं जो हमें वहां खड़ा कर देता है कि प्रतीत होता है कि हम एक दूसरे के शत्रु हैं।
जटायु श्रीराम जी के मुख से सीता हरण करने वाला पापी रावण को मुक्त होकर उनके लोक में आना सुनकर ,जहां जाना बड़े बड़े ऋषि मुनियों के लिए भी कठिन है, अत्यंत आश्चर्य में पड़ गए...
सीता हरन तात जनि कहेहु पिता सन जाई।
जौं मैं राम त *कुल सहित कहिहि दसानन आई*।।
ऐसे ऐसे पापी जो गाय ,भैंस, गदहे, मनुष्य, बंदर आदि को खा जाते हैं वे वैकुंठ जाएंगे??
ये तो बिल्कुल वेद शास्त्र के नियमों (जो जस करइ सो तस फल चाखा)के विरुद्ध है कि नहीं???
पर श्रीराम मत कहता है कि केवल कर्म नहीं बल्कि उसकी परिस्थितियों पर भी ध्यान दीजिए कि विश्रवा मुनि के संतान असुर क्यों हुए?
राजा सुकेतु की पुत्री ताड़का ऐसी दुष्टा क्यों हुई???
हां ये सत्य है कि कर्मफल मिले पर उसकी स्थिति परिस्थिति पर भी विचार करते हुए...
एकहि बान प्रान हरी लीन्हा।
और अब ये दीन कहां जाएगी इस पर विचार करते हुए...
दीन जानि तेही निज पद दीन्हा।।
मेरे राम जी की यही विशेषता *रामत्व* प्रदान करता है....
सभी मित्रों को विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनाएं
सादर प्रणाम
जय जय सीताराम जी

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दुर्गाष्टमी

दुर्गाष्टमी का हिन्दू धर्म में बड़ा ही महत्त्व है। प्रत्येक माह में शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि पर दुर्गाष्टमी व्रत किया जाता है, इसे 'मासिक दुर्गाष्टमी' भी कहते हैं। इस दौरान श्रद्धालु दुर्गा माता की पूजा करते हैं और उनके लिए पूरे दिन का व्रत करते हैं। मुख्य दुर्गाष्टमी, जिसे 'महाष्टमी' कहा जाता है, आश्विन माह में नौ दिन के शारदीय नवरात्र उत्सव के दौरान पड़ती है। दुर्गाष्टमी को 'दुर्गा अष्टमी' और 'मासिक दुर्गाष्टमी' को 'मास दुर्गाष्टमी' के नाम से भी जाना जाता है। भगवती दुर्गा को उबाले हुए चने, हलवा-पूरी, खीर, पुए आदि का भोग लगाया जाता है। इस दिन देवी दुर्गा की मूर्ति का मन्त्रों से विधिपूर्वक पूजन किया जाता है। बहुत-से व्यक्ति इस महाशक्ति को प्रसन्न करने के लिए हवन आदि भी करते हैं। शक्तिपीठों में इस दिन बहुत उत्सव मनाया जाता है।
तिथि प्रत्येक माह में शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को 'दुर्गाष्टमी' मनाई जाती है। मुख्य दुर्गाष्टमी, जिसे 'महाष्टमी' कहा जाता है, आश्विन माह में नौ दिन के शारदीय नवरात्र उत्सव के दौरान पड़ती है।
धार्मिक मान्यता भगवती दुर्गा का पूजन कर नवरात्र की पूर्णाहुति की जाती है। शक्ति पीठों में इस दिन बहुत उत्सव मनाया जाता है। इस दिन कन्या, लांगुरा जिमाए जाते हैं।

अन्य जानकारी इस पर्व पर नवमी को प्रात: काल देवी का पूजन किया जाता हैं। अनेक पकवानों से दुर्गाजी को भोग लगाया जाता है। छोटे बालक-बालिकाओं की पूजा करके उन्हें पूड़ी, हलवा, चने और भेंट दी जाती है।




महत्त्व
चैत्र शुक्ल अष्टमी का अत्यन्त विशिष्ट महत्त्व है। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को नवरात्र पूजा का जो आयोजन प्रारम्भ होता है, वह आज ही के दिन या दूसरे दिन नवमी को पूर्णता प्राप्त करता है। आज के दिन ही आदिशक्ति भवानी का प्रादुर्भाव हुआ था। भगवती भवानी अजेय शक्तिशालिनी महानतम शक्ति हैं और यही कारण है कि इस अष्टमी को महाष्टमी कहा जाता है। महाष्टमी को भगवती के भक्त उनके दुर्गा, काली, भवानी, जगदम्बा, दवदुर्गा आदि रूपों की पूजा-आराधना करते हैं। प्रतिमा को शुद्ध जल से स्नान कराकर वस्त्राभूषणों द्वारा पूर्ण श्रृंगार किया जाता है और फिर विधिपूर्वक आराधना की जाती है। हवन की अग्नि जलाकर धूप, कपूर, घी, गुग्गुल और हवन सामग्री की आहुतियां दी जाती हैं। सिन्दूर में एक जायफल को लपेटकर आहुति देने का भी विधान है। धूप, दीप, नैवेद्य से देवी की पूजा करने के बाद मातेश्वरी की जय बोलते हुए 101 परिक्रमाएं दी जाती हैं। कुछ क्षेत्रों में गोबर से पार्वती जी की प्रतिमा बनाकर पूजने का विधान भी है। वहाँ इस दिन कुमारियां तथा सुहागिने पार्वती जी को गोबर निर्मित प्रतिमा का पूजन करती हैं। नवरात्रों के पश्चात् इसी दिन दुर्गा का विसर्जन किया जाता है। इस पर्व पर नवमी को प्रात: काल देवी का पूजन किया जाता हैं। अनेक पकवानों से दुर्गाजी को भोग लगाया जाता है। छोटे बालक-बालिकाओं की पूजा करके उन्हें पूड़ी, हलवा, चने और भेंट दी जाती है।



दुर्गाष्टमी की कथा
प्राचीन हिन्दू शास्त्रों के अनुसार देवी दुर्गा के नौ रूप हैं। उन सब रूपों की अवतार कथाएं इस प्रकार हैं।

एक बार जब प्रलय काल में सारा संसार जलमय था अर्थात् चारों ओर पानी ही पानी दिखाई देता था, उस समय भगवान विष्णु की नाभि से एक कमल उत्पन्न हुआ। उस कमल से ब्रह्मा जी निकले। उसी समय भगवान नारायण के कानों में से जो मैल निकला उससे मधु और कैटभ नाम के दो दैत्य उत्पन्न हुए। जब उन दैत्यों ने चारों ओर देखा तो उन्हें ब्रह्माजी के अलावा कुछ भी दिखाई नहीं दिया। वे दोनों कमल पर बैठे ब्रह्माजी पर टूट पड़े, तब भयभीत होकर ब्रह्माजी ने विष्णु की स्तुति की। विष्णु जी की आंखों में उस समय महामाया योगानिद्रा के रूप में निवास कर रही थी। ब्रह्मा की स्तुति से वे लोप हो गई और विष्णु भगवान नींद से जाग उठे। उनके जागते ही वे दैत्य भगवान विष्णु से लड़ने लगे और उनमें 5000 वर्ष तक युद्ध चलता रहा। अंत में भगवान विष्णु की रक्षा के लिए महामाया ने असुरों की बुद्धि पलट दी। तब वे असुर प्रसन्न हो विष्णुजी से कहने लगे- 'हम आपके युद्ध कौशल से प्रसन्न हैं, जो चाहो सो वर मांग लो।' भगवान विष्णु बोले-'यदि हमें वर देना है तो यह वर दो कि दैत्यों का नाश हो जाए। ' दैत्यों ने कहा- 'तथास्तु।' ऐसा कहते ही महाबली दैत्यों का विष्णुजी के हाथों नाश हो गया। जिसने असुरों की बुद्धि को बदला था वह देवी थी 'महाकाली'।

महालक्ष्मी
एक समय महिषासुर नामक महाप्रतापी एक दैत्य हुआ। उसने समस्त राजाओं को हराकर पृथ्वी और पाताल पर अपना अधिकार जमा सब लोक जीत लिए। जब वह देवताओं से युद्ध करने लगा तो देवता उससे युद्ध में हारकर भागने लगे और भगवान विष्णु के पास पहुंचे। वे उस दैत्य से बचने के लिए विष्णु जी से प्रार्थना करने लगे। देवताओं की स्तुति करने से भगवान विष्णु और शंकर जी बहुत प्रसन्न हुए और उनके शरीर से एक तेज़ निकला, जिसने 'महालक्ष्मी' का रूप धारण कर लिया। उन्हें सब देवों ने अस्त्र शस्त्र और अलंकार दिए। इन्हें ले महालक्ष्मी ने महिषासुर दैत्य को युद्ध में मारकर देवताओं का कष्ट दूर किया।

महासरस्वती चामुण्डा
एक समय शुंभ-निशुंभ नामक दो बहुत बलशाली दैत्य हुए थे। उन्होंने युद्ध में मनुष्य क्या, सब देवता जीत लिए थे। जब देवताओं ने देखा कि अब वे युद्ध में नहीं जीत सकते, तब वे स्वर्ग छोड़कर भगवान विष्णु की स्तुति करने लगे। उस समय भगवान विष्णु की शरीर से एक नारी तेज़ प्रकट हुई, यही महासरस्वती थीं। महासरस्वती अत्यंत रूपवान थीं। उनका रूप देखकर वे दैत्य मोहित हो गए और उन्होंने सुग्रीव नाम का दूत उस देवी के पास भेजा। उस दूत को देवी ने वापस कर दिया। उसके निराश होकर लौटने पर उन दोनों ने सोच-समझकर अपने सेनापति धूम्राक्ष को सेना सहित भेजा उसे देवी ने सेना सहित मार दिया। फिर चण्ड-मुण्ड देवी से लड़ने आए और वे भी मारे गए। तत्पश्चात् रक्तबीज नाम का दैत्य लड़ने आया, जिसके रक्त की एक बूंद ज़मीन पर गिरने से एक वीर पैदा होता था। उसे भी देवी ने मार डाला। अंत में शुंभ-निशुंभ स्वयं चामुण्डा से लड़ने आए और देवी के हाथों मारे गए। सभी देवता, दैत्यों की मृत्यु के बाद बहुत ख़ुश हुए। इस प्रकार देवताओं को फिर खोया हुआ स्वर्ग का राज्य मिला।

योगमाया
जब कंस ने वसुदेव-देवकी के छ: पुत्रों का वध कर दिया और सातवें बलराम जी रोहिणी के गर्भ में प्रवेश होकर प्रकट हुए, तब आठवाँ जन्म (अवतार) कृष्ण का हुआ। उसी समय गोकुल में यशोदा जी के गर्भ से योगमाया का जन्म हुआ जो वसुदेव के द्वारा कृष्ण के बदले में मथुरा लायी गई। जब कंस ने कन्या रूपी योगमाया को मारने के लिए पटकना चाहा तो वह हाथ से छूटकर आकाश में उड़ गई और देवी का रूप धारण कर लिया। इसी योगमाया ने कृष्ण के साथ योगविद्या और महाविद्या बनकर कंस, चाणूर आदि शक्तिशाली असुरों का संहार कराया।

रक्तदन्तिका
एक बार जब पृथ्वी पर वैप्रचित नाम के असुर का उत्पात बढ़ा, उसने मनुष्य ही नहीं बल्कि देवताओं तक को बहुत दु:ख दिया। पृथ्वी और देवताओं की प्रार्थना पर उस समय देवी दुर्गा ने रक्तदन्तिका नाम से अवतार लिया और असुरों का भक्षण किया। वह देवी असुरों को मारकर रक्तपान किया करती थी। इस कारण इनका नाम रक्तदन्तिका पड़ा।

शाकम्भरी
एक बार पृथ्वी पर लगातार सौ वर्ष तक वर्षा न हुई। तब अन्न-जल के अभाव में समस्त प्रजा मरने लगी। इस कारण चारों ओर हाहाकार मच गया। समस्त जीव भूख से व्याकुल होकर मरने लगे। उस समय समस्त मुनियों ने मिलकर देवी भगवती की उपासना की। जिससे दुर्गा जी ने शाकम्भरी नाम से स्त्री रूप में अवतार लिया और उनकी कृपा से वर्षा हुई। इस अवतार में महामाया ने जलवृष्टि से पृथ्वी को हरी साग-सब्जी और फलों से परिपूर्ण कर दिया। जिससे पृथ्वी के समस्त जीवों को जीवनदान प्राप्त हुआ।

दुर्गा
एक समय दुर्गम नाम का एक राक्षस हुआ। उसके डर से पृथ्वी ही नहीं, स्वर्ग और पाताल लोक के निवासी भी भयभीत रहते थे। ऐसी विपत्ति के समय भगवान की शक्ति ने दुर्ग या दुर्गसैनी के नाम से अवतार लिया। जिसने दुर्गम राक्षस को मारकर हरिभक्तों की रक्षा की। दुर्गम राक्षस को मारने के कारण ही इनका नाम दुर्गा प्रसिद्ध हो गया। दुर्गा जी की पूजा में दुर्गा जी की आरती और दुर्गा चालीसा का पाठ किया जाता है।

भ्रामरी
एक समय महा अत्याचारी अरुण नाम के एक असुर ने स्वर्ग में जाकर उपद्रव करना शुरू कर दिया। वह देवताओं की पत्नियों का सतीत्व नष्ट करने की कुचेष्टा करने लगा। अपने सतीत्व की रक्षा के लिए देव-पत्नियां देवी दुर्गा से प्रार्थना करने लगीं। देव पत्नियों को दुखी देख दुर्गा ने भ्रामरी का रूप धारण करके असंख्य भौरों के दल के रूप में प्रगट हो काट-काटकर अपने विष से उस असुर को सेना सहित मार गिराया। इसी से वह भ्रामरी के नाम से प्रसिद्ध हुई।

चण्डिका
एक समय पृथ्वी पर चंड और मुंड नाम के दो राक्षस पैदा हुए। वे दोनों इतने बलवान थे कि उन्होंने संसार में अपना राज्य फैला लिया और स्वर्ग के देवताओं को पराजित कर वहां भी अपना अधिकार जमा लिया। इस प्रकार देवता दुखी होकर देवी की स्तुति करने लगे। तब देवी चण्डिका के रूप में प्रकट हुई और चंड-मुंड नामक राक्षसों को मारकर संसार का दु:ख दूर किया। उन्होंने देवताओं का छीना गया स्वर्ग पनु: उन्हें दे दिया। इस प्रकार चारों तरफ सुख का साम्राज्य छा गया।

मंगलवार, 9 अक्तूबर 2018

महिषासुरमर्दिनि स्तोत्रम्

अयि गिरिनन्दिनि नन्दितमेदिनि विश्वविनोदिनि नन्दिनुते
गिरिवरविन्ध्यशिरोऽधिनिवासिनि विष्णुविलासिनि जिष्णुनुते ।
भगवति हे शितिकण्ठकुटुम्बिनि भूरिकुटुम्बिनि भूरिकृते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १ ॥

सुरवरवर्षिणि दुर्धरधर्षिणि दुर्मुखमर्षिणि हर्षरते
त्रिभुवनपोषिणि शङ्करतोषिणि किल्बिषमोषिणि घोषरते
दनुजनिरोषिणि दितिसुतरोषिणि दुर्मदशोषिणि सिन्धुसुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २ ॥

अयि जगदम्ब मदम्ब कदम्ब वनप्रियवासिनि हासरते
शिखरि शिरोमणि तुङ्गहिमलय शृङ्गनिजालय मध्यगते ।
मधुमधुरे मधुकैटभगञ्जिनि कैटभभञ्जिनि रासरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ३ ॥

अयि शतखण्ड विखण्डितरुण्ड वितुण्डितशुण्द गजाधिपते
रिपुगजगण्ड विदारणचण्ड पराक्रमशुण्ड मृगाधिपते ।
निजभुजदण्ड निपातितखण्ड विपातितमुण्ड भटाधिपते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ४ ॥

अयि रणदुर्मद शत्रुवधोदित दुर्धरनिर्जर शक्तिभृते
चतुरविचार धुरीणमहाशिव दूतकृत प्रमथाधिपते ।
दुरितदुरीह दुराशयदुर्मति दानवदुत कृतान्तमते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ५ ॥

अयि शरणागत वैरिवधुवर वीरवराभय दायकरे
त्रिभुवनमस्तक शुलविरोधि शिरोऽधिकृतामल शुलकरे ।
दुमिदुमितामर धुन्दुभिनादमहोमुखरीकृत दिङ्मकरे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ६ ॥

अयि निजहुङ्कृति मात्रनिराकृत धूम्रविलोचन धूम्रशते
समरविशोषित शोणितबीज समुद्भवशोणित बीजलते ।
शिवशिवशुम्भ निशुम्भमहाहव तर्पितभूत पिशाचरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ७ ॥

धनुरनुषङ्ग रणक्षणसङ्ग परिस्फुरदङ्ग नटत्कटके
कनकपिशङ्ग पृषत्कनिषङ्ग रसद्भटशृङ्ग हताबटुके ।
कृतचतुरङ्ग बलक्षितिरङ्ग घटद्बहुरङ्ग रटद्बटुके
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ८ ॥

सुरललना ततथेयि तथेयि कृताभिनयोदर नृत्यरते
कृत कुकुथः कुकुथो गडदादिकताल कुतूहल गानरते ।
धुधुकुट धुक्कुट धिंधिमित ध्वनि धीर मृदंग निनादरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ९ ॥

जय जय जप्य जयेजयशब्द परस्तुति तत्परविश्वनुते
झणझणझिञ्झिमि झिङ्कृत नूपुरशिञ्जितमोहित भूतपते ।
नटित नटार्ध नटी नट नायक नाटितनाट्य सुगानरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १० ॥

अयि सुमनःसुमनःसुमनः सुमनःसुमनोहरकान्तियुते
श्रितरजनी रजनीरजनी रजनीरजनी करवक्त्रवृते ।
सुनयनविभ्रमर भ्रमरभ्रमर भ्रमरभ्रमराधिपते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ११ ॥

सहितमहाहव मल्लमतल्लिक मल्लितरल्लक मल्लरते
विरचितवल्लिक पल्लिकमल्लिक झिल्लिकभिल्लिक वर्गवृते ।
शितकृतफुल्ल समुल्लसितारुण तल्लजपल्लव सल्ललिते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १२ ॥

अविरलगण्ड गलन्मदमेदुर मत्तमतङ्ग जराजपते
त्रिभुवनभुषण भूतकलानिधि रूपपयोनिधि राजसुते ।
अयि सुदतीजन लालसमानस मोहन मन्मथराजसुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १३ ॥

कमलदलामल कोमलकान्ति कलाकलितामल भाललते
सकलविलास कलानिलयक्रम केलिचलत्कल हंसकुले ।
अलिकुलसङ्कुल कुवलयमण्डल मौलिमिलद्बकुलालिकुले
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १४ ॥

करमुरलीरव वीजितकूजित लज्जितकोकिल मञ्जुमते
मिलितपुलिन्द मनोहरगुञ्जित रञ्जितशैल निकुञ्जगते ।
निजगणभूत महाशबरीगण सद्गुणसम्भृत केलितले
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १५ ॥

कटितटपीत दुकूलविचित्र मयुखतिरस्कृत चन्द्ररुचे
प्रणतसुरासुर मौलिमणिस्फुर दंशुलसन्नख चन्द्ररुचे
जितकनकाचल मौलिमदोर्जित निर्भरकुञ्जर कुम्भकुचे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १६ ॥

विजितसहस्रकरैक सहस्रकरैक सहस्रकरैकनुते
कृतसुरतारक सङ्गरतारक सङ्गरतारक सूनुसुते ।
सुरथसमाधि समानसमाधि समाधिसमाधि सुजातरते ।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १७ ॥

पदकमलं करुणानिलये वरिवस्यति योऽनुदिनं सुशिवे
अयि कमले कमलानिलये कमलानिलयः स कथं न भवेत् ।
तव पदमेव परम्पदमित्यनुशीलयतो मम किं न शिवे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १८ ॥

कनकलसत्कलसिन्धुजलैरनुषिञ्चति तेगुणरङ्गभुवम्
भजति स किं न शचीकुचकुम्भतटीपरिरम्भसुखानुभवम् ।
तव चरणं शरणं करवाणि नतामरवाणि निवासि शिवम्
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १९ ॥

तव विमलेन्दुकुलं वदनेन्दुमलं सकलं ननु कूलयते
किमु पुरुहूतपुरीन्दु मुखी सुमुखीभिरसौ विमुखीक्रियते ।
मम तु मतं शिवनामधने भवती कृपया किमुत क्रियते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २० ॥

अयि मयि दीन दयालुतया कृपयैव त्वया भवितव्यमुमे
अयि जगतो जननी कृपयासि यथासि तथानुमितासिरते ।
यदुचितमत्र भवत्युररीकुरुतादुरुतापमपाकुरुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २१ ॥

शनिवार, 6 अक्तूबर 2018

लल्ला की सुन के मै आयी यशोदा मैया देदो बधाई,
कान्हा की सुनके मै आयी यशोदा मैया देदो बधाई,
लाला जनम सुन आयी यशोदा मैया देदो बधाई।

देदो बधाई मैया देदो बधाई,
लल्ला की सुन के मै आयी यशोदा मैया देदो बधाई।

टीका भी लूँगी मैया, बिंदियां भी लूँगी,
रेशम की लूँगी रजाई यशोदा मैया देदो बधाई।

साड़ी भी लूँगी मैया, लहँगा भी लूँगी,
धोती भी लूँगी मैया, कुर्ता भी लूँगी,
पगडि की होगी चढ़ाई यशोदा मैया देदो बधाई।

हरवा भी लूँगी मैया, चुड़ि भी लूँगी,
कंगना पे होगी चढ़ाई यशोदा मैया देदो बधाई।

चन्द्र सखी भज, बाल कृष्ण छवि,
नित नित जाऊँ बलिहारी यशोदा मैया देदो बधाई।

शुक्रवार, 5 अक्तूबर 2018

स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान् सर्वत्र पूज्यते

विद्वत्वं च नृपत्वं च न एव तुल्ये कदाचन्। स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान् सर्वत्र पूज्यते॥

भावार्थ :
विद्वता और राज्य अतुलनीय हैं, राजा को तो अपने राज्य में ही सम्मान मिलता है पर विद्वान का सर्वत्र सम्मान होता है|


स्वगृहे पूज्यते मूर्खः स्वग्रामे पूज्यते प्रभुः। स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान् सर्वत्र पूज्यते।।

अर्थात- मूर्ख अपने घर में महत्व पाता है, प्रभु (धनाड्य व्यक्ति) अपने गाँव में और राजा अपने देश में पूजा जाता है। जबकि विद्वान सभी जगहों पर पूजा जाता है।

बुधवार, 3 अक्तूबर 2018

चतुः श्लोकी भागवत Chatuh Shloki Bhagwat

चतुः श्लोकी भागवत
श्रीभगवानुवाच - 
अहमेवासमेवाग्रे नान्यद्
यत् सदसत् परम्। 
पश्चादहं यदेतच्च 
योऽवशिष्येत सोऽस्म्यहम् ॥१॥

ऋतेऽर्थं यत् प्रतीयेत 
न प्रतीयेत चात्मनि। 
तद्विद्यादात्मनो मायां 
यथाऽऽभासो यथा तमः ॥२॥

यथा महान्ति भूतानि 
भूतेषूच्चावचेष्वनु। 
प्रविष्टान्यप्रविष्टानि 
तथा तेषु न तेष्वहम्॥३॥

एतावदेव जिज्ञास्यं 
तत्त्वजिज्ञासुनाऽऽत्मनः। 
अन्वयव्यतिरेकाभ्यां यत् 
स्यात् सर्वत्र सर्वदा॥४॥

श्री भगवान कहते हैं - सृष्टि से पूर्व केवल मैं ही था। सत्, असत् या उससे परे मुझसे भिन्न कुछ भी नहीं था। सृष्टि न रहने पर (प्रलय काल में) भी मैं ही रहता हूँ। यह सब सृष्टि रूप भी मैं ही हूँ और जो कुछ इस सृष्टि, स्थिति तथा प्रलय से बचा रहता है, वह भी मै ही हूँ॥१॥
जो मुझ मूल तत्त्व के अतिरिक्त (सत्य सा) प्रतीत होता(दिखाई देता) है परन्तु आत्मा में प्रतीत नहीं होता (दिखाई नहीं देता), उस अज्ञान को आत्मा की माया समझो जो प्रतिबिम्ब या अंधकार की भांति मिथ्या है॥२॥
जैसे पंचमहाभूत (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश) संसार के छोटे-बड़े सभी पदार्थों में प्रविष्ट होते हुए भी उनमें प्रविष्ट नहीं हैं, वैसे ही मैं भी सबमें व्याप्त होने पर भी सबसे पृथक् हूँ।॥३॥
आत्म-तत्त्व को जानने की इच्छा रखने वाले के लिए इतना ही जानने योग्य है कि अन्वय (सृष्टि) अथवा व्यतिरेक (प्रलय) क्रम में जो तत्त्व सर्वत्र एवं सर्वदा(स्थान और समय से परे) रहता है, वही आत्मतत्त्व है॥४॥

English
Lord says - I only existed in the beginning(before any creation). There was neither manifest nor un-manifest or anything beyond both  which is other than me. I am all which is visible. Whatever remains after annihilation is also me.॥1॥
 Whatever appears to be substantial besides me, has no reality in itself. Know this ignorance as my illusory power Maya. It is unreal like a reflection or darkness.॥2॥ As five universal elements(earth, water, fire, air and space) pervade everything in the universe and at the same time they exist without them; similarly, I also pervade everything I create and at the same time I exist without them.॥3॥ A person willing to know the supreme truth, should only know that whatever exist eternally(beyond time) and everywhere(beyond space), during the process of creation and annihilation is the ultimate truth.॥4॥

सुभाषितानि

अकारणं रूपमकारणं कुलं महत्सु नीचेषु च कर्म शोभते।
इदं हि रूपं परिभूतपूर्वकं तदेव भूयो बहुमानमागतम्॥


Neither beauty nor lineage is the factor responsible for people to be great or small. Be a mighty or a small person, it is his work that adores him. If one concentrates more on his work than his external appearance, he will surely attain more respect. लोगों के लिए महान या छोटा होने के लिए न तो उनका सौंदर्य और न ही कुल जिम्मेदार घटक हैं। चाहे कोई बड़ा हो या छोटा हो, यह उस व्यक्ति का कार्य है जो उसे बनाता हैं। यदि कोई सुंदरता की अपेक्षा अपने काम पर अधिक ध्यान केंद्रित करता है, तो वह निश्चित रूप से अधिक सम्मान प्राप्त करेगा।

मंगलवार, 2 अक्तूबर 2018

सुभाषितानि

विद्या ददाति विनयं विनयाद्याति पात्रताम् ।
पात्रत्वाद्धनमाप्नोति धनाद्धर्मं ततः सुखम् ॥


Knowledge gives modesty, through modesty comes worthiness. By worthiness one gets prosperity and from prosperity (one does) good deeds and thereupon (one is) free from sorrow.


विद्या विनय देती हैं, विनय से योग्यता आती हैं। योग्यता से सम्म्पन्नता आती हैं, जिस से कर्तव्य-कर्म कर पाना संभव होता हैं, जिससे अंततः उसे दुखरहित स्थिति प्राप्त होती हैं।



सोमवार, 1 अक्तूबर 2018

निर्वाण षटकम्

निर्वाण षटकम्

मनो बुध्यहंकारचित्तानि नाहम् न च श्रोत्र जिह्वे न च घ्राण नेत्रे
न च व्योम भूमिर  न तेजो न वायुः चिदानन्द रूपः शिवोहम्  शिवोहम् ॥

न च प्राण संज्ञो न वै पञ्चवायुः न वा सप्तधातुर् न वा पञ्चकोशः
न वाक्पाणिपादौ  न चोपस्थपायू  चिदानन्द रूपः शिवोहम्  शिवोहम् ॥

न मे द्वेष रागौ न मे लोभ मोहौ मदो नैव मे नैव मात्सर्य भावः
न धर्मो न चार्थो न कामो ना  मोक्षः चिदानन्द रूपः शिवोहम्  शिवोहम् ॥

न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दुःखम् न मंत्रो न तीर्थं न वेदाः न यज्ञाः
अहं भोजनं नैव भोज्यं न भोक्ता चिदानन्द रूपः शिवोहम्  शिवोहम् ॥

न मृत्युर् न शंका न मे जातिभेदः पिता नैव  मे नैव माता न जन्म
न बन्धुर् न मित्रं गुरुर्नैव शिष्यः चिदानन्द रूपः शिवोहम्  शिवोहम् ॥

अहं निर्विकल्पो निराकार रूपो विभुत्वाच्च सर्वत्र सर्वेंद्रियाणाम्
न चासंगतं नैव मुक्तिर् न मेयः चिदानन्द रूपः शिवोहम्  शिवोहम् ॥

मनसा सततम् स्मरणीयम्

मनसा सततम् स्मरणीयम्
वचसा सततम् वदनीयम्
लोकहितम् मम करणीयम् ॥धृ॥
न भोग भवने रमणीयम्
न च सुख शयने शयनीयम्
अहर्निशम् जागरणीयम्
लोकहितम् मम करणीयम् ॥१॥
न जातु दुःखम् गणनीयम्
न च निज सौख्यम् मननीयम्
कार्य क्षेत्रे त्वरणीयम्
लोकहितम् मम करणीयम् ॥२॥
दुःख सागरे तरणीयम्
कष्ट पर्वते चरणीयम्
विपत्ति विपिने भ्रमणीयम्
लोकहितम् मम करणीयम् ॥३॥
गहनारण्ये घनान्धकारे
बन्धु जना ये स्थिता गह्वरे
तत्र मया सन्चरणीयम्
लोकहितम् मम करणीयम् ॥४॥

प्रणम्य शिरसा देवं

प्रणम्य शिरसा देवं


प्रणम्य शिरसा देवं गौरीपुत्रं विनायकम् ।
भक्तावासं स्मरेन्नित्यं आयुःकामार्थसिद्धये ॥ १॥
प्रथमं वक्रतुण्डं च एकदन्तं द्वितीयकम् ।
तृतीयं कृष्णपिङ्गाक्षं गजवक्त्रं चतुर्थकम् ॥ २॥
लम्बोदरं पञ्चमं च षष्ठं विकटमेव च ।
सप्तमं विघ्नराजेन्द्रं धूम्रवर्णं तथाष्टमम् ॥ ३॥
नवमं भालचन्द्रं च दशमं तु विनायकम् ।
एकादशं गणपतिं द्वादशं तु गजाननम् ॥ ४॥ 
द्वादशैतानि नामानि त्रिसंध्यं यः पठेन्नरः ।
न च विघ्नभयं तस्य सर्वसिद्धिकरः प्रभुः ॥ ५॥ 
विद्यार्थी लभते विद्यां धनार्थी लभते धनम् ।
पुत्रार्थी लभते पुत्रान्मोक्षार्थी लभते गतिम् ॥ ६॥ 
जपेद्गणपतिस्तोत्रं षड्भिर्मासैः फलं लभेत् ।
संवत्सरेण सिद्धिं च लभते नात्र संशयः ॥ ७॥
अष्टेभ्यो ब्राह्मणेभ्यश्च लिखित्वा यः समर्पयेत् ।
तस्य विद्या भवेत्सर्वा गणेशस्य प्रसादतः ॥ ८॥ 

श्री गजानन प्रसन्न


॥ श्री गजानन प्रसन्न ॥

गणनायकाय गणदेवताय गणाध्यक्षाय धीमहि ।
गुणशरीराय गुणमण्डिताय गुणेशानाय धीमहि ।
गुणातीताय गुणाधीशाय गुणप्रविष्टाय धीमहि ।
एकदंताय वक्रतुण्डाय गौरीतनयाय धीमहि ।
गजेशानाय भालचन्द्राय श्रीगणेशाय धीमहि ॥

गानचतुराय गानप्राणाय गानान्तरात्मने ।
गानोत्सुकाय गानमत्ताय गानोत्सुकमनसे ।
गुरुपूजिताय गुरुदेवताय गुरुकुलस्थायिने ।
गुरुविक्रमाय गुह्यप्रवराय गुरवे गुणगुरवे ।
गुरुदैत्यगलच्छेत्रे गुरुधर्मसदाराध्याय ।
गुरुपुत्रपरित्रात्रे गुरुपाखण्डखण्डकाय ।
गीतसाराय गीततत्त्वाय गीतगोत्राय धीमहि ।
गूढगुल्फाय गन्धमत्ताय गोजयप्रदाय धीमहि ।
गुणातीताय गुणाधीशाय गुणप्रविष्टाय धीमहि ।
एकदंताय वक्रतुण्डाय गौरीतनयाय धीमहि ।
गजेशानाय भालचन्द्राय श्रीगणेशाय धीमहि ॥

ग्रन्थगीताय ग्रन्थगेयाय ग्रन्थान्तरात्मने ।
गीतलीनाय गीताश्रयाय गीतवाद्यपटवे ।
गेयचरिताय गायकवराय गन्धर्वप्रियकृते ।
गायकाधीनविग्रहाय गङ्गाजलप्रणयवते ।
गौरीस्तनन्धयाय गौरीहृदयनन्दनाय ।
गौरभानुसुताय गौरीगणेश्वराय ।
गौरीप्रणयाय गौरीप्रवणाय गौरभावाय धीमहि ।
गोसहस्राय गोवर्धनाय गोपगोपाय धीमहि ।
गुणातीताय गुणाधीशाय गुणप्रविष्टाय धीमहि ।
एकदंताय वक्रतुण्डाय गौरीतनयाय धीमहि ।
गजेशानाय भालचन्द्राय श्रीगणेशाय धीमहि ॥



Mangal Stotra | मंगल स्तोत्र

Mahashivratri Katha - 5 | शंखचूड़ का वध

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