रामायणं

यत्पूर्वं प्रभुणा कृतं सुकविना श्रीशम्भुना दुर्गमं 
श्रॆमद्रामपदाब्जभक्तिमनिशम प्राप्त्यै तू रामायणं।
मत्वा तद्रघुनाथनामनिरतम स्वान्तस्तम:शान्तये
भाषाबद्ध्मिदम चकार तुलसीदासस्तथा मानसं।।1।।
पुण्यं पापहरं सदा शिवकरं विज्ञानाभाक्तिप्रदम
मायामोहमलापहं सुविमलं प्रेमाम्बुपूरं शुभम।
श्रॆमद्रामचरितमानसमिदम भक्त्यावगाहन्ति ये
ते सन्सारपतनगघोरकिरनैर्दह्यन्ति नो मानवाः।।2।।

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