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रविवार, 3 मार्च 2019

Mahashivratri Katha - 5 | शंखचूड़ का वध

शिव उपासना में शंख का इस्तेमाल वर्जित माना जाता है। दरअसल भगवान शिव ने शंखचूड़ नाम के असुर का वध किया था, जो भगवान विष्णु का भक्त था। शंख को उसी असुर का प्रतीक माना जाता है। इसलिए शिवजी की पूजा में कभी भी शंख नहीं बजाना चाहिए। [[श्रीमद् भागवतम् स्कंद १० I अध्याय ३४ ]]


दैत्यराज दंभ ने श्रीहरि को प्रसन्नकर उनके समान बलवान पुत्र शंखचूड़ प्राप्त किया. आरंभ में शंखचूड़ धर्मवान था. उसने पुष्कर में तप से ब्रह्माजी को प्रसन्न किया व देवताओं से अजेय होने का वर मांगा. ब्रह्माजी ने मनचाहे वर के साथ नारायण कवच भी प्रदान किया.
शंखचूड का विवाह साध्वी तुलसी से हुआ. श्रीहरि के आशीर्वाद से जन्मे व ब्रह्मा से वरदान प्राप्त शंखचूड ने तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया. त्रस्त देवता श्रीहरि की शरण में गए. प्रभु बोले- शंखचूड़ मेरे वरदान से जन्मा है. उसका अंत केवल महादेव ही कर सकते हैं. देवों ने महादेव को कष्ट और श्रीहरि का आदेश बताया तो शिवजी उसके अंत को तैयार हो गए. शिवजी और शंखचूड़ के बीच युद्ध शुरू हुआ.
नारायण कवच के अलावा पत्नी तुलसी ने पतिव्रत के प्रभाव से शंखचूड़ को अभेद्य कवच से युक्त कर दिया. महादेव हजारों वर्षों के युद्ध के बाद भी उसका वध नहीं कर पा रहे थे. देवों ने श्रीहरि से शंखचूड़ वध की राह निकालने को कहा. श्रीहरि ब्राह्मण रूप धरकर गए और शंखचूड से नारायण कवच दान में मांग लिया.
तुलसी का पतिव्रत कवच भेदना था. श्रीहरि ने शंखचूड़ का ही रूप धरा और तुलसी के पास पहुंचे. वर्षों बाद पति को देख प्रसन्न तुलसी ने पत्नी समान प्रेम किया. इससे तुलसी का पतिव्रत व कवच दोनों खंडित हो गए तो महादेव ने त्रिशूल प्रहार से शंखचूड़ का वध कर दिया. प्रहार से नारायण के समान बलशाली शंखचूड की अस्थियां चूर हुईं तो शंख का जन्म हुआ. शंखचूड़ विष्णु भक्त था इसलिए श्रीहरि को शंख से जल चढ़ाने का विधान है पर महादेव ने उसका वध किया था अतः शंख से शिवजी को जल नहीं चढ़ाया जाता | 

Mahashivratri Katha - 4

फाल्गुन मास के दिन आने वाली महाशिवरात्रि पर शिव जी और मां पार्वती का विवाह हुआ था। इसलिए भी इस पर्व को महाशिवरात्रि कहा जाता है। इस दिन शिव की पूजा विधि विधान से करें। शिव जी पर एक लोटा जल चढ़ाने से ही भगवान इंसान की मुराद पूरी कर देता है। 

Mahashivratri Katha - 3 | नीलकंठ

भागवत् पुराण के अनुसार समुद्र मंथन के समय वासुकी नाग के मुख में भयंकर विष की ज्वालाएं उठी और वे समुद्र में मिश्रित हो विष के रूप में प्रकट हो गई। विष की यह आग की ज्वालाएं पूरे आकाश में फैलकर सारे जगत को जलाने लगी। इसके बाद सभी देवता, ऋषि-मुनि भगवान शिव के पास मदद के लिए गए। इसके बाद भगवान शिव प्रसन्न हुए और उस विष को पी लिया। इसके बाद से ही उन्हें नीलकंठ कहा जाने लगा। 

शनिवार, 2 मार्च 2019

Mahashivratri katha-2


भगवान शिव ने केतकी का फूल का  पूजा से किए त्याग क्यों किया ?




शिवरात्रि हर माह के कृष्ण पक्ष कि चतुर्दशी तिथि को मनाई जाती है, किन्तु फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को महाशिवरात्रि के रूप में मनाया जाता है।

एक बार भगवान विष्णु और ब्रह्मा जी कौन बड़ा और कौन छोटा है, इस बात का फैसला कराने के लिए भगवान शिव के पास पहुंचे। इस पर भगवान शिव ने एक शिवलिंग को प्रकट कर उन्हें उसके आदि और अंत पता लगाने को कहा। उन्होंने कहा जो इस बात का उत्तर दे देगा वही बड़ा है। इसके बाद विष्णु जी उपर की ओर चले और काफी दूर तक जाने के बाद पता नहीं लगा पाए। उधर ब्रह्मा जी नीचे की ओर चले और उन्हें भी कोई छोर न मिला। नीचे की ओर जाते समय उनकी नजर केतकी के पुष्प पर पड़ी, जो उनके साथ चला आ रहा था। उन्होंने केतकी के पुष्प को भगवान शिव से झूठ बोलने के लिए मना लिया। जब ब्रह्मा जी ने भगवान शिव से कहा कि मैंने पता लगा लिया है और केतकी के पुष्प से झूठी गवाही भी दिलवा दी तो त्रिकालदर्शी शिव ने ब्रह्मा जी और केतकी के पुष्प का झूठ जान लिया। उसी समय उन्होंने न सिर्फ ब्रह्मा जी के उस सिर को काट दिया जिसने झूठ बोला था बल्कि केतकी की पुष्प को अपनी पूजा में प्रयोग किए जाने के अधिकार से भी वंचित कर दिया।

अतः भगवान शिव की पूजा में भूलकर भी केतकी का फूल न चढ़ाएंं ।

Mahashivratri Katha - 1



(शिवपुराण )
 पूर्वकाल में चित्रभानु नामक एक शिकारी था। जानवरों की हत्या करके वह अपने परिवार को पालता था। वह एक साहूकार का कर्जदार था, लेकिन उसका ऋण समय पर न चुका सका। क्रोधित साहूकार ने शिकारी को शिवमठ में बंदी बना लिया। संयोग से उस दिन शिवरात्रि थी। शिकारी ध्यानमग्न होकर शिव-संबंधी धार्मिक बातें सुनता रहा। उस चतुर्दशी को उसने शिवरात्रि व्रत की कथा भी सुनी। जिससे उसके मन में शिव के प्रति अनुराग उत्पन्न होने लगा।
शिव कथा सुनने से उसके पाप क्षीण होने लगे। वह यह वचन देकर कि अगले दिन सारा ऋण लौटा दूंगा, जंगल में शिकार के लिए चला गया। शिकार खोजता हुआ, वह बहुत दूर निकल गया। शाम हो गई किन्तु उसे कोई शिकार नहीं मिला तो वह तालाब के किनारे एक बेल के पेड़ पर चढ़कर रात्रि में जल पीने के लिए आने वाले जीवों का इंतज़ार करने लगा। बिल्व वृक्ष के नीचे शिवलिंग था, जो बिल्वपत्रों से ढंका हुआ था। शिकारी को उसका पता न चला। प्रतीक्षा, तनाव और दिनभर भूखा-प्यासा शिकारी बेल के पत्ते तोड़ता और नीचे फेंक देता। इस प्रकार बिल्बपत्र शिवलिंग पर गिरते गए और चूंकि उसने दिनभर कुछ नहीं खाया था, इसलिए भूख-प्यास से व्याकुल शिकारी का व्रत भी हो गया।

रात्रि के प्रथम प्रहर में एक गर्भिणी हिरणी तालाब पर पानी पीने पहुँची। चित्रभानु ज्यों ही उसे धनुष-बाण से मारने चला हिरणी बोली, 'मैं गर्भिणी हूं। शीघ्र ही प्रसव करूंगी। तुम एक साथ दो जीवों की हत्या करोगे, जो ठीक नहीं है। मैं बच्चे को जन्म देकर शीघ्र ही तुम्हारे समक्ष प्रस्तुत हो जाऊंगी। शिकारी को उस पर दया आ गई और उसने हिरनी को जाने दिया। इस दौरान वह तनाव में बेलपत्र तोड़कर नीचे फेकता गया। अतः अनजाने में ही वह प्रथम प्रहर के शिव पूजा का फलभागी हो गया। 

कुछ ही देर बाद एक और हिरणी उधर से निकली। चित्रभानु उसे मारने ही वाला था कि हिरणी ने विनम्रतापूर्वक निवेदन किया कि हे शिकारी! मैं अपने प्रिय की खोज में भटक रही हूं। अपने पति से मिलकर शीघ्र ही तुम्हारे पास आ जाऊंगी। शिकारी ने उसे भी जाने दिया। इस प्रकार चित्रभानु तनावग्रस्त बेलपत्र निचे फेंकता रहा जो शिवलिंग गिरते रहे। उस समय रात्रि का दूसरा प्रहर चल रहा था, अतः अनजाने में इस प्रहर में भी उसके द्वारा बेलपत्र शिवलिंग पर चढ़ गए। 

कुछ देर बाद एक और हिरणी अपने बच्चों के साथ तालाब के किनारे जल पीने के लिए आई। जैसे ही उसने हिरनी को मारना चाहा हिरणी बोली, 'हे शिकारी! मैं इन बच्चों को इनके पिता को सौंप कर लौट आऊंगी। इस समय मुझे मत मारो। हिरणी का दीन स्वर सुनकर शिकारी को उस पर भी दया आ गई। उसने उस हिरनी को भी जाने दिया। शिकार के अभाव में तथा भूख-प्यास से व्याकुल शिकारी अनजाने में ही बेल-वृक्ष पर बैठा बेलपत्र तोड़-तोड़कर नीचे फेंकता जा रहा था। रात्रिभर शिकारी के तनाववश बेलपत्र नीचे फेंकते रहने से शिवलिंग पर अनगिनत पर बेलपत्र चढ़ गए। 

सुबह एक मृग उसी रास्ते पर आया। शिकारी ने ज्यों ही उसे मारना चाहा, वह भी करुण स्वर में बोला हे शिकारी! यदि तुमने मुझसे पूर्व आने वाली तीन मृगियों और बच्चों को मार डाला है, तो मुझे भी मार दो ताकि मुझे उनके वियोग का दुःख न सहना पड़े। मैं उन हिरणियों का पति हूं। यदि तुमने उन्हें जीवनदान दिया है, तो मुझे भी कुछ क्षण का जीवन देने की कृपा करो। मैं उनसे मिलकर तुम्हारे समक्ष उपस्थित हो जाऊंगा। शिकारी ने उस हिरण को भी जाने दिया।

सुबह होते-होते उपवास, रात्रि-जागरण तथा शिवलिंग पर अनजाने में चढ़े बेलपत्र के फलस्वरूप शिकारी का हृदय अहिंसक हो गया। उसमें शिव भक्तिभाव जागने लगा थोड़ी ही देर बाद वह मृग सपरिवार शिकारी के समक्ष उपस्थित हो गया, जंगली पशुओं की ऐसी सत्यता, सात्विकता और प्रेम के प्रति समर्पण देखकर शिकारी ने सबको छोड़ दिया। इस प्रकार रात्रि के चारों प्रहर में हुई शिव पूजा से उसे शिवलोक की प्राप्ति हुई। अतः भोलेनाथ की पूजा चाहे जिस अवस्था में करें, उसका फल मिलना निश्चित है। यही परम सत्य भी है। 

Mahashivratri Katha - 5 | शंखचूड़ का वध

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