Mahashivratri Katha - 3 | नीलकंठ

भागवत् पुराण के अनुसार समुद्र मंथन के समय वासुकी नाग के मुख में भयंकर विष की ज्वालाएं उठी और वे समुद्र में मिश्रित हो विष के रूप में प्रकट हो गई। विष की यह आग की ज्वालाएं पूरे आकाश में फैलकर सारे जगत को जलाने लगी। इसके बाद सभी देवता, ऋषि-मुनि भगवान शिव के पास मदद के लिए गए। इसके बाद भगवान शिव प्रसन्न हुए और उस विष को पी लिया। इसके बाद से ही उन्हें नीलकंठ कहा जाने लगा। 

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

कष्ट विमोचन मंगल स्तोत्र

अच्युतस्याष्टकम् : अच्युतं केशवं रामनारायणम्

श्री गजानन प्रसन्न